मोदी जी, हम आज भी आपके साथ खड़े हैं, लेकिन इस मुद्दे पर भीतर तक आहत हैं

मोदी जी
✍️मोदी जी, हम आपके विरोधी नहीं… लेकिन अपने जन्म के कारण अपराधी समझे जाने की आशंका से आहत हैं
✍️प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर समर्थक डॉ. अभिषेक कुमार का खुला खत—UGC Equity Regulations को लेकर जताई गहरी आपत्ति, बोले- न्याय जाति देखकर नहीं, व्यक्ति देखकर हो

मोदी जी

आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नाम एक खुला खत
आदरणीय मोदी जी,
भारत देश के यशस्वी प्रधानमंत्री,
सादर प्रणाम 🙏
आज आपके जन्मदिन के अवसर पर आपको शुभकामनाएँ देते हुए मेरे मन में अनेक भाव एक साथ उमड़ रहे हैं… गौरव, सम्मान, कृतज्ञता और आज के समय की एक गहरी पीड़ा।
मैंने आपको केवल देश के प्रधानमंत्री के रूप में नहीं देखा है… पिछले वर्षों में आपके अनेक निर्णयों का समर्थन किया है… आपके नेतृत्व का बचाव किया है और जब-जब आपके निर्णयों पर राजनीतिक या वैचारिक हमला हुआ… तब-तब अपनी क्षमता के अनुसार आपके पक्ष में मजबूती से खड़ा रहा हूँ।
कई बार यह समर्थन केवल सार्वजनिक बहस तक सीमित नहीं रहा… विरोधियों से बहस हुई… आपके निर्णयों के पक्ष में अपने निकट संबंधों तक में मतभेद हुए और कभी-कभी उसकी कीमत निजी रिश्तों में आई खटास के रूप में भी चुकानी पड़ी।
जब ऑपरेशन सिंदूर को लेकर आपको राजनीतिक विरोधियों द्वारा “नरेंदर- सरेंडर” तरह-तरह के विशेषण गढ़े गए, तब भी मैंने आपके निर्णय का बचाव किया… इसी क्रम में मैंने “पहलगाम हमला Vs ऑपरेशन सिंदूर” जैसी पुस्तक लिखकर अपनी समझ और अपना पक्ष देश के सामने रखने का प्रयास किया… इसलिए आज जो लिख रहा हूँ, वह किसी राजनीतिक विरोधी की शिकायत नहीं है… यह एक समर्थक की व्यथा है।
मोदी जी, आपके नेतृत्व में देश ने अनेक क्षेत्रों में परिवर्तन देखे हैं… जनकल्याणकारी योजनाओं के व्यापक क्रियान्वयन से लेकर डिजिटल भारत तक, वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती सक्रियता से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्नों पर लिए गए कठोर निर्णयों तक… आपके कार्यकाल के अनेक पक्षों को लेकर आपके समर्थकों के मन में उपलब्धि और आत्मविश्वास की भावना रही है… कोरोना जैसी अभूतपूर्व महामारी के कठिन दौर में देश ने जिस चुनौती का सामना किया, वह भी हमारे समय के सबसे कठिन अध्यायों में से एक रही… सेना के साहसिक अभियानों से लेकर विदेश नीति के स्तर पर भारत की बढ़ती सक्रियता तक, आपके नेतृत्व की अपनी एक स्पष्ट पहचान बनी है… और शायद इसी कारण आपसे अपेक्षाएँ भी इतनी बड़ी हैं… इसी अपेक्षा के कारण आज आपसे असहमति व्यक्त करने का साहस कर रहा हूँ।
UGC के नए Equity Regulations को लेकर गहरी आपत्ति
मोदी जी, UGC के नए Equity Regulations को लेकर मेरे मन में गहरी आपत्ति है… इन नियमों को लेकर सामान्य वर्ग के युवाओं के बीच जो आशंकाएँ पैदा हुई हैं, उन्हें केवल राजनीतिक विरोध या किसी विशेष जाति की नाराज़गी समझकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए… जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों के क्रियान्वयन पर रोक लगाते हुए इनके कुछ प्रावधानों को प्रथम दृष्टया अस्पष्ट और दुरुपयोग की संभावना वाला माना था… अगस्त 2026 में केंद्र सरकार ने भी सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि इन नियमों पर पुनर्विचार किया जा रहा है।
मेरी आपत्ति किसी वंचित वर्ग को संरक्षण देने से नहीं है… मेरी आपत्ति उस व्यवस्था की संभावना से है जिसमें न्याय की खोज करते-करते किसी दूसरे वर्ग के निर्दोष युवाओं के मन में यह भय पैदा हो जाए कि उनकी जाति ही उनके विरुद्ध एक स्थायी संदेह का आधार बन सकती है।
“हम सामान्य वर्ग के युवा भी इसी देश के नागरिक हैं”
मोदी जी, हम सामान्य वर्ग के युवा भी इसी देश के नागरिक हैं… हमने भी स्कूल – कॉलेजों में पढ़ाई की है, प्रतियोगी परीक्षाएँ दी हैं, संघर्ष किया है, बेरोजगारी झेली है, असफलताएँ देखी हैं, अपने माता-पिता के सपनों का बोझ उठाया है और अपने भविष्य के लिए रात-दिन मेहनत की है…. हम जन्म से अपराधी नहीं हैं… किसी व्यक्ति का जन्म जिस परिवार या जाति में हुआ, वह उसका चुनाव नहीं था… फिर केवल जन्म के आधार पर उसके प्रति ऐसा संस्थागत संदेह क्यों पैदा हो कि उसे स्वयं को निर्दोष साबित करने की चिंता सताने लगे?
सामाजिक न्याय आवश्यक है… जातिगत भेदभाव के विरुद्ध कठोर व्यवस्था भी आवश्यक है… लेकिन न्याय का अर्थ यह नहीं हो सकता कि एक निर्दोष नागरिक की गरिमा दूसरे नागरिक की सुरक्षा के लिए बलि चढ़ जाए…. न्याय का सबसे सुंदर रूप वही है जिसमें पीड़ित को संरक्षण मिले और निर्दोष को भय से मुक्ति।
“सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” की भावना पर सवाल
मोदी जी, आपने बार-बार सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास की बात की है… इसी कारण मेरा प्रश्न और भी सीधा है… क्या ऐसा रास्ता नहीं निकाला जा सकता जिसमें SC, ST और OBC सहित प्रत्येक वंचित वर्ग को मजबूत कानूनी संरक्षण मिले, लेकिन सामान्य वर्ग के युवाओं को भी समान रूप से न्यायसंगत प्रक्रिया, शिकायतों के दुरुपयोग से सुरक्षा और अपनी बात रखने का अधिकार मिले?
आपने हिंदुत्व की बात की है… हिंदुत्व मेरे लिए समाज को जोड़ने की चेतना है, समाज को जातिगत खाँचों में और गहरा बाँटने की नहीं…. इसीलिए जब किसी नीति को लेकर मेरे जैसे समर्थक के मन में यह भाव पैदा होता है कि उसके साथ उसकी जाति के कारण अलग व्यवहार हो सकता है, तो पीड़ा केवल राजनीतिक नहीं रहती, वह व्यक्तिगत हो जाती है।
“हम आपके विरोधी नहीं हैं”
मैं यह पत्र किसी धमकी, दबाव या राजनीतिक सौदेबाजी के रूप में नहीं लिख रहा हूँ… मैं यह पत्र इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि मैंने आपका समर्थन किया है और इसलिए आपसे असहमति व्यक्त करने का अधिकार भी अपने भीतर महसूस करता हूँ… मेरी आपसे करबद्ध प्रार्थना है कि इस पूरे विषय पर एक बार फिर गंभीरता से विचार कीजिए… ऐसी व्यवस्था बनाइए जिसमें जाति के आधार पर किसी के साथ अन्याय न हो, लेकिन किसी निर्दोष को उसकी जाति के कारण अपराधबोध भी न दिया जाए।
यदि किसी प्रावधान में संशोधन आवश्यक है तो कीजिए… यदि कोई शब्दावली भ्रम पैदा कर रही है तो उसे बदलिए… यदि किसी वर्ग को लगता है कि उसके साथ न्याय नहीं हो रहा, तो उसकी शिकायत भी सुनिए… और यदि किसी प्रावधान से सामान्य वर्ग के युवाओं में यह भय पैदा हो रहा है कि वे जन्म से ही संदेह की दृष्टि से देखे जाएँगे, तो उस भय को भी उतनी ही गंभीरता से सुनिए।
कभी-कभी पीछे हटना पराजय नहीं होता, बल्कि भविष्य की मजबूत नींव रखने का साहस होता है… आज आपके जन्मदिन पर मैं आपसे कोई राजनीतिक वादा नहीं चाहता… मैं केवल इतना चाहता हूँ कि मेरे जैसे उन करोड़ों युवाओं की आवाज़ भी आपके कानों तक पहुँचे, जिन्होंने वर्षों तक आपके नेतृत्व पर भरोसा किया है, लेकिन आज इस मुद्दे पर अपने मन में गहरी बेचैनी महसूस कर रहे हैं।
मोदी जी, हम आपके विरोधी नहीं हैं… हम चाहते हैं कि आप ऐसा भारत बनाएँ जिसमें किसी दलित को उसकी जाति के कारण अपमान न सहना पड़े, किसी आदिवासी को अवसर से वंचित न किया जाए, किसी पिछड़े वर्ग के युवा को अन्याय न झेलना पड़े और साथ ही किसी सामान्य वर्ग के युवा को भी यह महसूस न हो कि उसका जन्म ही उसके विरुद्ध एक आरोप है।
आप देश के प्रधानमंत्री हैं… आपसे अपेक्षा भी पूरे देश की है… समाज को जोड़िए, समाज को बाँटने वाली हर आशंका को समाप्त कीजिए… आज आपके जन्मदिन पर आपको हृदय से शुभकामनाएँ… ईश्वर आपको स्वस्थ, यशस्वी और दीर्घायु बनाए… देश के लिए आपके भीतर जो ऊर्जा और संकल्प है, वह दीर्घकाल तक बना रहे… और मेरी सबसे बड़ी प्रार्थना यही है-
मेरी इस बात को एक विरोधी की आवाज़ समझकर मत सुनिएगा… इसे अपने उस समर्थक की आवाज़ समझकर सुनिएगा, जो आज भी आपके साथ खड़ा है, लेकिन अपने जन्म के कारण स्वयं को अपराधी समझे जाने की आशंका से भीतर तक आहत है।
आपसे केवल एक आग्रह है… इस निर्णय पर पुनर्विचार कीजिए… ऐसा भारत बनाइए जहाँ न्याय जाति देखकर नहीं, व्यक्ति देखकर हो।
सादर,
डॉ. अभिषेक कुमार
(एक समर्थक, जिसकी असहमति भी उसी विश्वास से जन्मी है जिसने वर्षों तक उसे आपका समर्थक बनाए रखा।)
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