नाना पाटेकर निधन: उनके जाने के बाद सिनेमा से जुड़ा यह सवाल

नाना पाटेकर निधन
Advertisement
भारत गुरु स्कूल विज्ञापन

नाना पाटेकर निधन: उनके जाने के बाद सिनेमा से जुड़ा यह सवाल जरूर रह गया

नाना पाटेकर निधन: आज हर तरफ एक ही खबर है—नाना पाटेकर नहीं रहे। सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलियां हैं, उनकी फिल्मों के दृश्य फिर से साझा किए जा रहे हैं और उनके पुराने संवादों की क्लिप्स एक बार फिर लोगों की टाइमलाइन पर दिखाई दे रही हैं। लेकिन जब किसी कलाकार के जाने की खबर कुछ ही घंटों में लाखों लोगों तक पहुंच चुकी हो, तब उस खबर को दोहराने का कोई खास अर्थ नहीं रह जाता।

Advertisement
ईश्वर हॉस्पिटल विज्ञापन

असली सवाल कुछ और है।

Advertisement
भारत गुरु स्कूल विज्ञापन

नाना पाटेकर चले गए, लेकिन क्या उनके साथ अभिनय का वह दौर भी चला गया, जिसमें अभिनेता को स्टार बनने से पहले कलाकार होना पड़ता था?

शायद नाना पाटेकर निधन की खबर को याद करने का सबसे सही तरीका यही सवाल है।

नाना पाटेकर आखिर इतने अलग क्यों थे?

हिंदी सिनेमा में अभिनेता बहुत आए। कुछ ने लोकप्रियता हासिल की, कुछ ने बॉक्स ऑफिस पर बड़े रिकॉर्ड बनाए और कुछ समय के साथ लोगों की स्मृति से उतर गए।

नाना पाटेकर इन सबसे अलग थे।

उनके अभिनय में एक ऐसी बेचैनी थी, जो दर्शक को चैन से बैठने नहीं देती थी। वह जब स्क्रीन पर आते थे तो सिर्फ अपना संवाद नहीं बोलते थे। वह किरदार के भीतर मौजूद आदमी को सामने ले आते थे।

उनकी आवाज में एक खास तरह की खुरदुराहट थी। चेहरे पर बनावटी चमक नहीं, बल्कि जिंदगी की थकान, गुस्सा, दर्द और सवाल दिखाई देते थे।

यही वजह है कि नाना पाटेकर को सिर्फ उनकी फिल्मों की संख्या से नहीं समझा जा सकता।

नाना पाटेकर निधन के बाद सिनेमा के सामने बड़ा सवाल

नाना पाटेकर निधन के बाद सबसे बड़ा सवाल

नाना पाटेकर का फिल्मी सफर 1978 में गमन से शुरू हुआ। आगे चलकर परिंदा, प्रहार, क्रांतिवीर, खामोशी, तिरंगा, अब तक छप्पन और वेलकम जैसी फिल्मों ने उन्हें अलग-अलग पीढ़ियों के दर्शकों तक पहुंचाया।

गंभीर भूमिकाओं से लेकर हास्य और नकारात्मक किरदारों तक उन्होंने अपनी अलग छाप छोड़ी।

लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि उन्होंने खुद को किसी एक छवि में कैद नहीं होने दिया।

वह जब गंभीर किरदार करते थे तो दर्शक असहज हो जाता था।

जब खलनायक बनते थे तो उससे नफरत होने लगती थी।

और जब वेलकम में उदय शेट्टी बने तो वही दर्शक उन्हें देखकर हंसता भी था।

यही किसी बड़े अभिनेता की पहचान है।

वह आपको अपनी भूमिका के हिसाब से बदल देता है।

उनकी आवाज ही उनका परिचय बन गई

आज सिनेमा में संवाद अदायगी को लेकर बहुत कुछ कहा जाता है। लेकिन नाना पाटेकर के मामले में आवाज केवल संवाद बोलने का माध्यम नहीं थी।

वह अभिनय का हिस्सा थी।

उनकी आवाज में गुस्सा आता था तो लगता था जैसे सामने वाला सचमुच नाराज है। दर्द आता था तो वह बनावटी नहीं लगता था। व्यंग्य करते थे तो शब्दों से ज्यादा उनका ठहराव बोलता था।

शायद यही कारण है कि उनके कई किरदार और संवाद आज भी लोगों की बातचीत में जीवित हैं।

एक अभिनेता के लिए इससे बड़ी उपलब्धि क्या हो सकती है कि उसकी फिल्म खत्म होने के वर्षों बाद भी उसका अंदाज लोगों की याद में बचा रहे?

स्टार बनने की कोशिश नहीं की, अभिनेता बने रहे

नाना पाटेकर के दौर को समझने के लिए उस समय के सिनेमा को भी समझना होगा।

वह समय ऐसा था जब अभिनेता को केवल लोकप्रिय चेहरा होने से काम नहीं चलता था। किरदार में उतरना पड़ता था। संवाद को महसूस करना पड़ता था। कई बार अपनी शक्ल-सूरत से ज्यादा किरदार की जरूरत को महत्व देना पड़ता था।

नाना ने यही किया।

उन्होंने अपने अभिनय को किसी एक फॉर्मूले में बंद नहीं किया।

शायद इसीलिए आज भी जब उनके पुराने दृश्य सामने आते हैं तो वे पुराने नहीं लगते।

अच्छा अभिनय समय के साथ पुराना नहीं होता।

आज के सिनेमा के सामने यही सबसे बड़ा सवाल है

नाना पाटेकर का निधन सिर्फ एक अभिनेता का जाना नहीं है।

यह एक ऐसे दौर की याद भी है, जिसमें अभिनेता की पहचान उसके चेहरे या सोशल मीडिया की लोकप्रियता से ज्यादा उसके अभिनय की सच्चाई से होती थी।

आज फिल्म उद्योग बदल चुका है।

स्टार की लोकप्रियता अब केवल सिनेमाघर की सीटों से तय नहीं होती। सोशल मीडिया फॉलोअर्स, वायरल वीडियो, ब्रांड और डिजिटल मौजूदगी भी किसी कलाकार की लोकप्रियता का हिस्सा बन चुके हैं।

यह बदलाव बुरा है या अच्छा, यह अलग बहस है।

लेकिन नाना पाटेकर जैसे अभिनेता हमें यह याद जरूर दिलाते हैं कि लोकप्रिय होना और महान अभिनेता होना एक ही बात नहीं है।

लोकप्रियता समय के साथ बदल सकती है।

अभिनय की सच्चाई लंबे समय तक रहती है।

पर्दे के बाहर भी सिर्फ अभिनेता नहीं थे

नाना पाटेकर की पहचान सिनेमा से बाहर भी थी। किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े सामाजिक कार्यों में उनकी भागीदारी ने उनके व्यक्तित्व के दूसरे पक्ष को सामने रखा।

अभिनय और सामाजिक सरोकार—दोनों क्षेत्रों में उनकी मौजूदगी ने उन्हें केवल फिल्मी चेहरा बनने से अलग रखा।

वह कैमरे के सामने किसी और की जिंदगी जीते थे और कैमरे के पीछे अपने तरीके से समाज को देखते थे।

यही वजह है कि उनके जाने का असर केवल फिल्म जगत तक सीमित नहीं है।

जाने से कुछ दिन पहले तक लोगों के बीच थे

नाना पाटेकर की आखिरी सार्वजनिक मौजूदगी भी उनके निधन से कुछ दिन पहले गोवा में हुई थी।

कुछ दिन पहले तक जो कलाकार लोगों के बीच मौजूद था, उसके लिए आज लाखों लोग श्रद्धांजलि लिख रहे हैं।

जिंदगी शायद इसी तरह है।

कल तक जो व्यक्ति मंच पर खड़ा होकर लोगों से बात कर रहा था, आज उसकी तस्वीर के सामने लोग फूल रख रहे हैं।

मृत्यु किसी पटकथा की तरह समय देखकर नहीं आती।

नाना पाटेकर की सबसे बड़ी विरासत क्या होगी?

तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, पद्म श्री, दर्जनों यादगार फिल्में और अनगिनत किरदार—नाना पाटेकर की उपलब्धियों की सूची लंबी है।

लेकिन उनकी सबसे बड़ी विरासत शायद इनमें से कोई नहीं है।

उनकी सबसे बड़ी विरासत यह है कि उन्होंने यह साबित किया कि अभिनेता बनने के लिए हमेशा चमकदार चेहरा जरूरी नहीं होता।

जरूरी है तो किरदार के भीतर उतरने की क्षमता।

जरूरी है तो सच बोलने की हिम्मत।

जरूरी है तो कैमरे के सामने खुद को भूल जाने की कला।

और शायद यही कारण है कि नाना पाटेकर की फिल्मों को आने वाली पीढ़ियां भी देखेंगी।

नाना पाटेकर निधन की खबर पुरानी होगी, यादें नहीं

आज हम कह रहे हैं—नाना पाटेकर नहीं रहे।

कुछ दिनों बाद यह खबर पुरानी हो जाएगी। नई खबरें आएंगी। नई फिल्में आएंगी। नए कलाकार लोकप्रिय होंगे।

फिर भी जब कभी कोई अभिनेता पर्दे पर इतना वास्तविक लगे कि दर्शक कुछ देर के लिए भूल जाए कि वह अभिनय कर रहा है, तब नाना पाटेकर याद आएंगे।

क्योंकि उन्होंने अभिनय को केवल पेशा नहीं बनाया।

नाना पाटेकर निधन

उन्होंने अभिनय को अपनी भाषा बना दिया था।

नाना पाटेकर का निधन भारतीय सिनेमा के लिए निश्चित रूप से एक बड़ी क्षति है। लेकिन उनके जाने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है—

क्या हम फिर कभी ऐसा अभिनेता देख पाएंगे, जिसे स्टार बनने की जरूरत ही महसूस न हो और जिसका अभिनय ही उसकी पहचान बन जाए?

शायद इसका जवाब अभी हमारे पास नहीं है।

लेकिन इतना जरूर है—

नाना पाटेकर चले गए हैं। उनकी फिल्में नहीं गईं। उनके किरदार नहीं गए। उनकी आवाज नहीं गई।

और महान कलाकार शायद इसी तरह मरने के बाद भी जिंदा रहते हैं।

Begusarai Locals 

🥇बल्ले-गेंद से दिखाया दम: बेगूसराय के नन्हे क्रिकेटरों ने ठोकी जिला टीम में एंट्री की दावेदारी”

📍बेगूसराय बस स्टैंड में फायरिंग, दो को लगी गोली

 

 

 

समाचार विचार को सहयोग करें

Share this post:

खबरें और भी हैं...