तीन साल से शहर में तैनात यातायात मित्रों पर सवाल: सालाना 80 लाख खर्च को लेकर नगर निगम में विवाद

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तीन साल से बेगूसराय शहर की यातायात व्यवस्था को सुचारू रखने के उद्देश्य से नगर निगम द्वारा तैनात किए गए यातायात मित्र अब निगम की राजनीति और वित्तीय बहस के केंद्र में आ गए हैं। यातायात मित्रों पर हर वर्ष करीब 80 लाख रुपये खर्च किए जाने को लेकर नगर निगम के भीतर सवाल उठने लगे हैं। 

⁉️ बेगूसराय के कई पार्षदों ने इस व्यवस्था की उपयोगिता, नियुक्ति प्रक्रिया और खर्च के औचित्य पर जताई आपत्ति

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🤝 महापौर पिंकी देवी बोलीं—शहर के लिए जरूरी है यह व्यवस्था

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समाचार विचार/बेगूसराय: शहर की यातायात व्यवस्था को सुचारू रखने के उद्देश्य से नगर निगम द्वारा तैनात किए गए यातायात मित्र अब निगम की राजनीति और वित्तीय बहस के केंद्र में आ गए हैं। तीन साल से यातायात मित्रों पर हर वर्ष करीब 80 लाख रुपये खर्च किए जाने को लेकर नगर निगम के भीतर सवाल उठने लगे हैं। कई पार्षदों ने इस व्यवस्था की उपयोगिता, नियुक्ति प्रक्रिया और खर्च के औचित्य पर आपत्ति जताते हुए इसे बंद करने की मांग की है। बताया जा रहा है कि पिछले तीन साल से शहर में यातायात मित्र कार्यरत हैं और अब तक इस व्यवस्था पर करीब 3 करोड़ 20 लाख रुपये खर्च किए जा चुके हैं। ऐसे में निगम बोर्ड के कुछ सदस्यों का कहना है कि जब पुलिस बल उपलब्ध है तो यातायात व्यवस्था के नाम पर अतिरिक्त कर्मियों पर इतनी बड़ी राशि खर्च करना उचित नहीं है। दूसरी ओर, नगर निगम की महापौर और इस व्यवस्था के समर्थक पार्षदों का मानना है कि बढ़ती आबादी, वाहनों की संख्या और शहर के व्यस्त इलाकों में लगने वाले जाम को देखते हुए यातायात मित्रों की भूमिका महत्वपूर्ण है।

80 लाख सालाना खर्च ने खड़ा किया बड़ा सवाल

नगर निगम में सबसे बड़ा विवाद यातायात मित्रों पर होने वाले खर्च को लेकर है। कुछ पार्षदों ने निगम प्रशासन को पत्र देकर इस मद में होने वाले खर्च और नियुक्ति की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। पार्षदों का कहना है कि प्रतिवर्ष करीब 80 लाख रुपये खर्च हो रहे हैं, जबकि शहर के विकास से जुड़े कई अन्य कार्यों में इस राशि का उपयोग किया जा सकता है। विरोध करने वाले पार्षदों का तर्क है कि पुलिस बल के रहते करीब 50 अप्रशिक्षित यातायात मित्रों की सेवा पर इतनी बड़ी रकम खर्च करना वित्तीय दृष्टि से उचित नहीं है। उनका कहना है कि नगर निगम को अपने सीमित संसाधनों का इस्तेमाल सड़क, नाला, सफाई, प्रकाश व्यवस्था और अन्य नागरिक सुविधाओं के विकास में प्राथमिकता के साथ करना चाहिए। इसी मुद्दे को लेकर नगर निगम बोर्ड की बैठक में भी प्रस्ताव लाने की बात कही गई है। पार्षदों की मांग है कि यातायात मित्रों की व्यवस्था, उनकी उपयोगिता और खर्च की पूरी समीक्षा की जाए।

तीन साल में 3.20 करोड़ रुपये खर्च होने का दावा

पार्षदों के अनुसार यातायात मित्रों पर अब तक करीब 3.20 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। इसके अलावा नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। कुछ पार्षदों ने दैनिक वेतन के आधार पर कर्मियों की नियुक्ति और विभागीय प्रक्रिया का पालन नहीं होने पर आपत्ति जताई है। आरोप है कि स्वीकृत पदों पर विभागीय नियुक्ति की प्रक्रिया अपनाए बिना तीन साल से दैनिक वेतन पर कर्मियों को रखा गया, जिससे हर वर्ष लाखों रुपये का अतिरिक्त खर्च हो रहा है। पार्षदों ने इसे नियमों के अनुरूप नहीं बताते हुए मामले की जांच और समीक्षा की मांग की है। इस विवाद ने नगर निगम के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर शहर की यातायात व्यवस्था के लिए बनाई गई यह व्यवस्था वर्तमान स्वरूप में कितनी प्रभावी और आर्थिक रूप से उचित है।

छह पार्षदों ने उठाए खर्च और नियुक्ति पर सवाल

मामले को लेकर पूर्व उपमहापौर समेत कई पार्षदों ने नगर आयुक्त को पत्र भेजकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं। पार्षदों ने यातायात मित्रों पर होने वाले खर्च के साथ-साथ उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं।पार्षदों का कहना है कि यदि नगर निगम की ओर से इतनी बड़ी राशि खर्च की जा रही है तो इसका स्पष्ट आकलन होना चाहिए कि यातायात मित्रों की तैनाती से तीन साल से शहर में जाम की समस्या में कितना सुधार हुआ है। साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि इन कर्मियों की जिम्मेदारियां क्या हैं और उनके कार्य का नियमित मूल्यांकन किस प्रकार किया जा रहा है। पार्षदों ने निगम के कार्य और वित्तीय नियमों के अनुरूप विभागीय प्रक्रिया अपनाने की मांग की है। उनका यह भी कहना है कि शहर के सभी वार्डों में जरूरत के अनुसार संतुलित तरीके से राशि खर्च की जानी चाहिए।

तीन साल से

महापौर बोलीं—शहर के लिए जरूरी है यह व्यवस्था

विवाद के बीच महापौर पिंकी देवी ने यातायात मित्रों की व्यवस्था को शहर के लिए आवश्यक बताया है। उनका कहना है कि तेजी से बढ़ती आबादी, अतिक्रमण और वाहनों के दबाव के कारण बेगूसराय में यातायात को नियंत्रित करना एक बड़ी चुनौती बन गया है। महापौर के अनुसार कालीस्थान चौक, मुख्य बाजार, कचहरी रोड, जामा मस्जिद चौक और अन्य व्यस्त इलाकों में अक्सर वाहनों की लंबी कतारें लग जाती थीं। ऐसे स्थानों पर यातायात मित्रों की तैनाती से जाम को नियंत्रित करने में मदद मिली है। उन्होंने कहा कि नगर निगम के पुनर्गठन के बाद और पूर्व महापौर की पहल पर बोर्ड ने सर्वसम्मति से यातायात मित्रों की तैनाती के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। पिछले तीन वर्षों से यह व्यवस्था शहर में लागू है और यातायात नियंत्रण में इसकी भूमिका रही है।

एम्बुलेंस को रास्ता दिलाने में भी मदद का दावा

महापौर ने यातायात मित्रों की उपयोगिता का उदाहरण देते हुए कहा कि पहले ट्रैफिक जाम के कारण रेलवे चौक से सदर अस्पताल तक एम्बुलेंस को पहुंचने में काफी समय लग जाता था। साइरन बजने के बावजूद कई बार जाम के कारण एम्बुलेंस को रास्ता नहीं मिल पाता था। उनका कहना है कि यातायात मित्र अब एम्बुलेंस और अन्य आपातकालीन वाहनों को रास्ता दिलाने में भी सहायता करते हैं। इससे गंभीर मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाने में मदद मिलती है। महापौर के मुताबिक डीएसपी, ट्रैफिक थानाध्यक्ष और पुलिस बल की मौजूदगी के बावजूद शहर के कई व्यस्त स्थानों पर अतिरिक्त सहयोग की जरूरत पड़ती है। ऐसे में यातायात मित्र स्थानीय स्तर पर यातायात को व्यवस्थित करने में सहयोगी भूमिका निभा रहे हैं।

कई व्यस्त इलाकों में संभाल रहे यातायात

शहर के कालीस्थान, कचहरी रोड, मुख्य बाजार, जामा मस्जिद, कर्पूरी स्थान, उत्क्रमण रोड और विष्णुपुर जैसे व्यस्त इलाकों में यातायात का दबाव अधिक रहता है। इन क्षेत्रों में सड़क किनारे अतिक्रमण और वाहनों की बढ़ती संख्या के कारण जाम की समस्या आम है। नगर निगम का पक्ष है कि यातायात मित्रों की तैनाती से इन इलाकों में वाहनों की आवाजाही को नियंत्रित करने में सहायता मिलती है। हालांकि विरोध कर रहे पार्षदों का कहना है कि केवल व्यवस्था होने का दावा पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके परिणामों और खर्च का ठोस आकलन होना चाहिए।

विवाद के बीच बोर्ड की बैठक पर टिकी नजर

यातायात मित्रों को लेकर शुरू हुआ विवाद अब नगर निगम बोर्ड की बैठक तक पहुंचने की संभावना है। विरोधी पार्षद इस मुद्दे पर चर्चा और प्रस्ताव लाने की तैयारी में हैं। वहीं, व्यवस्था के समर्थकों का कहना है कि बिना किसी विकल्प के यातायात मित्रों की सेवा बंद करना शहर की यातायात व्यवस्था के लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है।अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि नगर निगम यातायात मित्रों की वर्तमान व्यवस्था को जारी रखेगा, उसमें बदलाव करेगा या खर्च और नियुक्ति प्रक्रिया की समीक्षा के बाद कोई नया निर्णय लेगा। फिलहाल, एक ओर शहर की बढ़ती यातायात समस्या और जाम से राहत की जरूरत है, तो दूसरी ओर जनता के पैसे के उपयोग और नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आने वाले दिनों में नगर निगम बोर्ड की बैठक में होने वाली चर्चा से यह साफ हो सकता है कि तीन वर्षों से चल रही यातायात मित्रों की व्यवस्था का भविष्य क्या होगा।

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