अंधविश्वास और झाड़-फूंक के चक्कर में लोग अपनी कीमती जिंदगी गंवा रहे हैं। सर्पदंश जैसी गंभीर स्थिति में जहां तत्काल अस्पताल पहुंचकर इलाज कराना जरूरी है, वहीं कुछ लोग अब भी पारंपरिक झाड़-फूंक पर भरोसा कर बैठते हैं। इसका खामियाजा कई बार जान देकर चुकाना पड़ता है।
🚨मजनूपुर के महादलित टोले में मातम, बाहर रहकर मजदूरी करता है पति
🚨सर्पदंश के बाद समय पर इलाज नहीं मिलने से उठे कई सवाल
समाचार विचार | नावकोठी | बेगूसराय
आज भी ग्रामीण इलाकों में अंधविश्वास और झाड़-फूंक के चक्कर में लोग अपनी कीमती जिंदगी गंवा रहे हैं। सर्पदंश जैसी गंभीर स्थिति में जहां तत्काल अस्पताल पहुंचकर इलाज कराना जरूरी है, वहीं कुछ लोग अब भी पारंपरिक झाड़-फूंक पर भरोसा कर बैठते हैं। इसका खामियाजा कई बार जान देकर चुकाना पड़ता है। ऐसी ही एक दर्दनाक घटना बेगूसराय जिले के नावकोठी प्रखंड क्षेत्र के मजनूपुर गांव में सामने आई है, जहां सांप काटने के बाद कथित तौर पर झाड़-फूंक कराए जाने और इलाज में देरी के बीच एक गर्भवती महिला की मौत हो गई। इस घटना ने चार मासूम बच्चों को मां की ममता से हमेशा के लिए वंचित कर दिया है। मृतका की पहचान मजनूपुर गांव के वार्ड संख्या 03 स्थित महादलित टोला निवासी कृष्णा सदा की पत्नी चंपा देवी के रूप में हुई है। बताया जाता है कि सांप काटने के बाद परिजनों ने उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाने के बजाय झाड़-फूंक का सहारा लिया। इस दौरान समय बीतता गया और उनकी हालत बिगड़ती चली गई। अंततः रात करीब 12 बजे चंपा देवी की मौत हो गई। वह गर्भवती थीं। घटना के बाद से पूरे टोले में शोक का माहौल है।
अंधविश्वास के चक्कर में जिंदगी दांव पर लगाना कितना सही?
चंपा देवी की मौत सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि समाज के सामने एक गंभीर सवाल भी खड़ा करती है। आखिर कब तक लोग बीमारी और सर्पदंश जैसी आपात स्थितियों में वैज्ञानिक चिकित्सा के बजाय झाड़-फूंक पर निर्भर रहेंगे? जब किसी व्यक्ति को सांप काट लेता है, तब हर मिनट महत्वपूर्ण हो सकता है। ऐसे में झाड़-फूंक के चक्कर में अस्पताल पहुंचने में देरी करना जानलेवा साबित हो सकता है। अंधविश्वास के कारण समय पर इलाज नहीं मिलना कई परिवारों को जिंदगी भर का दर्द दे जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी और पारंपरिक मान्यताओं पर अत्यधिक भरोसा लोगों को समय रहते सही फैसला लेने से रोक सकता है। चंपा देवी की मौत ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि सर्पदंश के मामलों में जागरूकता और त्वरित चिकित्सा सहायता कितनी जरूरी है।
चार मासूम बच्चों के सिर से उठा मां का साया
चंपा देवी अपने पीछे चार छोटे-छोटे बच्चों को छोड़ गई हैं। उनका बड़ा बेटा सत्यम कुमार करीब 10 वर्ष का है। वहीं, सुकांत कुमारी सात वर्ष, विद्या कुमारी छह वर्ष और अंशिका कुमारी महज चार वर्ष की है। जिन बच्चों की उम्र अभी मां की गोद में खेलने और उसके स्नेह में पलने की है, उन्हें अब मां के बिना जिंदगी गुजारनी होगी। मां की असमय मौत से बच्चों के पालन-पोषण और भविष्य को लेकर गंभीर चिंता खड़ी हो गई है। परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। मां का साया उठ जाने से बच्चों के जीवन में जो खालीपन आया है, उसकी भरपाई करना आसान नहीं होगा।

बाहर रहकर मजदूरी करता है पति, परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़
चंपा देवी के पति कृष्णा सदा बाहर रहकर मजदूरी करते हैं। मेहनत-मजदूरी करके परिवार का भरण-पोषण करने वाले कृष्णा के सामने अब पत्नी को खोने का असहनीय दुख और चारों बच्चों की परवरिश की बड़ी जिम्मेदारी है। परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए आने वाले दिनों में बच्चों की पढ़ाई, देखभाल और रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
मदद की दरकार, खबर लिखे जाने तक नहीं पहुंचे जनप्रतिनिधि
घटना के बाद पीड़ित परिवार के घर मातम पसरा हुआ है। खबर लिखे जाने तक किसी जनप्रतिनिधि के पीड़ित परिवार से मिलने नहीं पहुंचने की जानकारी मिली थी। मौके पर पूर्व उपमुखिया अनिल महतो और पैक्स अध्यक्ष दिलीप कुमार मौजूद थे। स्थानीय स्तर पर परिवार की स्थिति को देखते हुए सहयोग की आवश्यकता महसूस की जा रही है। चार छोटे बच्चों के भविष्य और परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए पीड़ित परिवार को सहारा देने की जरूरत है, ताकि इस कठिन समय में बच्चों की देखभाल और उनकी पढ़ाई प्रभावित न हो।
सर्पदंश में झाड़-फूंक नहीं, अस्पताल पहुंचाना है जरूरी
चंपा देवी की मौत से समाज को सबक लेने की जरूरत है। सांप काटने पर झाड़-फूंक, ओझा-गुनी या घरेलू नुस्खों के भरोसे समय गंवाने के बजाय पीड़ित को तत्काल नजदीकी अस्पताल पहुंचाना चाहिए। सर्पदंश के हर मामले को गंभीरता से लेना जरूरी है, क्योंकि समय पर चिकित्सकीय सहायता और जरूरत पड़ने पर एंटीवेनम उपचार जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पीड़ित को झाड़-फूंक के लिए अस्पताल पहुंचाने में देरी नहीं करनी चाहिए। उसे शांत रखें, काटे गए अंग को यथासंभव स्थिर रखें और तुरंत चिकित्सा सहायता लें। घाव को काटने, जहर चूसने या कसकर पट्टी बांधने जैसे उपायों से बचना चाहिए।मजनूपुर की चंपा देवी अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी मौत समाज के सामने एक गंभीर संदेश छोड़ गई है। अंधविश्वास के बजाय समय पर इलाज को प्राथमिकता देना ही ऐसी दर्दनाक घटनाओं को रोकने की दिशा में सबसे जरूरी कदम है। सवाल यह है कि आखिर कब लोग समझेंगे कि झाड़-फूंक के चक्कर में गंवाया गया समय किसी की जिंदगी छीन सकता है?
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