दुष्कर्म के प्रयास के आरोप में पटना हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति को मिली चार साल की सजा रद्द कर दी है। साथ ही, महिला की लज्जा भंग करने और उसके घर में अनधिकृत रूप से घुसने के अपराध में उसकी दोषसिद्धि बरकरार रखी है।
📍बेगूसराय में 16 साल पुराने मामले पर हाईकोर्ट का फैसला: दुष्कर्म के प्रयास की सजा रद्द
📍पीड़िता को मिलेगा ₹25 हजार मुआवजा, फ़ैसले के बाद तेज हुई चर्चा
समाचार विचार/बेगूसराय: बिहार के बेगूसराय में एक विधवा महिला के साथ हुई घटना के करीब 16 साल बाद पटना हाईकोर्ट का फैसला आया है। अदालत ने दुष्कर्म के प्रयास के आरोप में एक व्यक्ति को मिली चार साल की सजा रद्द कर दी है। साथ ही, महिला की लज्जा भंग करने और उसके घर में अनधिकृत रूप से घुसने के अपराध में उसकी दोषसिद्धि बरकरार रखी है। अदालत ने पहले से जेल में बिताई गई अवधि को ही सजा मानते हुए पीड़िता को 25 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। न्यायमूर्ति संदीप कुमार की एकलपीठ ने 8 अक्टूबर 2026 को मोहम्मद ऐनुल हक की आपराधिक अपील पर यह फैसला सुनाया। इस फैसले के बाद महिला की सुरक्षा, यौन अपराधों में साक्ष्यों की भूमिका और कानून की कसौटी पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
आधी रात का मामला, दीया बुझाने के बाद मचा हंगामा
मामला फरवरी 2010 का है। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, रात करीब 10 बजे एक विधवा महिला अपने घर में थी, तभी आरोपी उसके घर में घुस गया। आरोप था कि उसने जलता हुआ दीया बुझा दिया और महिला के ऊपर लेटकर उसका मुंह दबा दिया, ताकि वह शोर नहीं मचा सके। महिला की आवाज सुनकर आसपास के ग्रामीण मौके पर पहुंचे और आरोपी को पकड़ लिया। रिपोर्टों के अनुसार, महिला ने पहले पुलिस में शिकायत करने की कोशिश की, लेकिन शिकायत दर्ज नहीं होने पर उसने अदालत का दरवाजा खटखटाया। इसके बाद मामले में कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ी।
निचली अदालत ने सुनाई थी चार साल की सजा
मामले की सुनवाई के बाद बेगूसराय की अतिरिक्त सत्र अदालत ने 29 जुलाई 2013 को आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376/511 के तहत दुष्कर्म के प्रयास और धारा 448 के तहत घर में अनधिकृत प्रवेश का दोषी ठहराया था। दुष्कर्म के प्रयास के मामले में चार साल की सश्रम कैद और घर में अनधिकृत प्रवेश के मामले में छह महीने की सश्रम कैद सुनाई गई थी। आरोपी ने इस फैसले को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी। अपील पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के प्रयास की दोषसिद्धि को कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं माना।
हाईकोर्ट ने क्यों रद्द की दुष्कर्म के प्रयास की दोषसिद्धि?
हाईकोर्ट ने माना कि महिला के घर में घुसने, दीया बुझाने, उसके ऊपर लेटने और मुंह दबाने की घटना के मूल हिस्से को साक्ष्य से समर्थन मिलता है। लेकिन अदालत के सामने यह साबित करने के लिए पर्याप्त और संगत साक्ष्य नहीं थे कि आरोपी ने दुष्कर्म करने की दिशा में ऐसा प्रत्यक्ष कदम उठाया था, जो कानून की नजर में दुष्कर्म का प्रयास माना जा सके। अदालत ने साक्ष्यों का मूल्यांकन करते हुए दुष्कर्म के प्रयास से जुड़ी दोषसिद्धि रद्द कर दी। हालांकि, महिला की लज्जा भंग करने के लिए आपराधिक बल के इस्तेमाल और घर में अनधिकृत प्रवेश के अपराधों में दोषसिद्धि बरकरार रखी गई।
25 हजार रुपये पीड़िता को देने का आदेश
हाईकोर्ट ने आरोपी की उम्र, पूर्व आपराधिक इतिहास नहीं होने और लंबे समय तक जमानत पर रहने सहित संबंधित परिस्थितियों पर विचार किया। अदालत ने दोनों अपराधों में कारावास की सजा को पहले से जेल में बिताई गई अवधि, यानी करीब ढाई महीने, तक सीमित कर दिया। इसके साथ ही आरोपी को आठ सप्ताह के भीतर 25 हजार रुपये जमा करने का निर्देश दिया गया है। यह पूरी राशि पीड़िता को मुआवजे के रूप में दी जाएगी। आदेश के मुताबिक, रकम जमा नहीं करने पर आरोपी को छह महीने की साधारण कैद भुगतनी पड़ सकती है।

फैसले का मतलब समझना जरूरी
इस मामले में हाईकोर्ट ने आरोपी को सभी आरोपों से बरी नहीं किया है। दुष्कर्म के प्रयास की दोषसिद्धि रद्द हुई है, लेकिन महिला की लज्जा भंग करने और घर में अनधिकृत प्रवेश के अपराधों में दोषसिद्धि बरकरार है। यही इस फैसले का अहम कानूनी पहलू है। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अलग-अलग अपराधों का आकलन किया और दुष्कर्म के प्रयास के आरोप को साबित करने के लिए आवश्यक कानूनी कसौटी पूरी नहीं होने की बात कही।
समाचार विचार की नजर से: यह मामला केवल एक पुराने मुकदमे के फैसले तक सीमित नहीं है। यह बताता है कि यौन अपराधों के मामलों में पीड़िता की शिकायत, गवाहों के बयान, जांच की गुणवत्ता और न्यायालय के सामने प्रस्तुत साक्ष्य कितने महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे मामलों में न्याय की उम्मीद तभी मजबूत होती है, जब जांच निष्पक्ष हो और मुकदमे की सुनवाई ठोस साक्ष्यों के आधार पर हो।
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