विविध भारती: जब रेडियो सिर्फ आवाज नहीं, जिंदगी का पार्श्व संगीत हुआ करता था
📍विविध भारती का स्थापना दिवस: 69 साल बाद भी दिलों में जिंदा है वो आवाज… जिसने पूरे देश को गीतों के धागे में पिरोया
📍3 अक्टूबर 1957 को हुई थी शुरुआत, रेडियो सीलोन की लोकप्रियता और फिल्मी गीतों पर प्रतिबंध के बीच जन्मा था ‘विविध भारती’
📍आज भी करोड़ों श्रोताओं की यादों में जिंदा है इसकी आवाज
समाचार विचार डेस्क
कुछ आवाजें सिर्फ कानों तक नहीं पहुंचतीं, वे सीधे स्मृतियों में उतर जाती हैं। कुछ कार्यक्रम सिर्फ मनोरंजन नहीं करते, बल्कि एक पूरे दौर की पहचान बन जाते हैं। विविध भारती ऐसी ही एक आवाज है, जिसने दशकों तक भारत के घर-घर में संगीत, सिनेमा और संस्कृति का रंग घोला। 3 अक्टूबर 1957 को शुरू हुई विविध भारती आज अपना स्थापना दिवस मना रही है। इसके जन्म की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है।
रेडियो सीलोन की चुनौती और फिल्मी गीतों पर प्रतिबंध ने दिखाई नई राह
उस दौर में रेडियो सीलोन की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही थी। दूसरी ओर आकाशवाणी पर फिल्मी गीतों के प्रसारण को लेकर प्रतिबंध था। ऐसे समय में एक ऐसे मनोरंजन चैनल की जरूरत महसूस हुई, जो श्रोताओं को विविध रंगों से जोड़ सके। जब इस नए चैनल के स्वरूप पर विचार हो रहा था, तब इसे ‘ऑल इंडिया वैरायटी प्रोग्राम’ कहा जाता था। बाद में इसके बहुरंगी स्वरूप को देखते हुए प्रसिद्ध कवि पंडित नरेंद्र शर्मा ने इसे एक नाम दिया—‘विविध भारती’।
नाम ऐसा था, जो आगे चलकर भारतीय रेडियो इतिहास का पर्याय बन गया।
वंदनवार से हवामहल तक… घर-घर पहुंची आवाज
शुरुआत के बाद विविध भारती बहुत जल्द पूरे देश के श्रोताओं की पसंद बन गया। वंदनवार, हवामहल, जयमाला और चित्रशाला जैसे कार्यक्रमों ने इसे घर-घर तक पहुंचाया। ‘जयमाला’ की शुरुआत अभिनेत्री नरगिस से हुई थी। आगे चलकर फिल्म उद्योग की तमाम मशहूर हस्तियां इस कार्यक्रम से जुड़ीं। विविध भारती सिर्फ गाने सुनाने वाला माध्यम नहीं रहा। इसने श्रोताओं को कलाकारों की आवाज, उनकी बातचीत और उनके व्यक्तित्व से भी परिचित कराया।
‘ये विविध भारती है… आकाशवाणी का पंचरंगी कार्यक्रम’
यह उद्घोषणा सुनते ही जाने कितने लोगों के चेहरे पर आज भी मुस्कान आ जाती होगी। उस दौर के उद्घोषक भी श्रोताओं के लिए किसी सितारे से कम नहीं थे। कांता गुप्ता, कब्बन मिर्जा और बृजभूषण साहनी जैसे नाम घर-घर पहचाने जाते थे। बच्चे उनकी आवाज और बोलने के अंदाज की नकल तक किया करते थे। विविध भारती की खासियत यही थी—उसने रेडियो को सिर्फ एक उपकरण नहीं रहने दिया, उसे घर के सदस्य जैसा बना दिया।
स्कूल जाते रास्ते में भी सुनाई देती थी विविध भारती की आवाज
यूनुस खान अपने संस्मरण में लिखते हैं कि भोपाल में बचपन के दिनों में पैदल स्कूल जाते हुए रास्ते के लगभग हर घर से विविध भारती की आवाज सुनाई देती थी।हवामहल की झलकियों में कलाकारों की अदाकारी की नकल करना, शनिवार को यह जानने की उत्सुकता रखना कि इस बार विशेष जयमाला कौन प्रस्तुत करेगा और पिकनिक पर जाते समय ट्रांजिस्टर साथ ले जाना—ये छोटी-छोटी यादें उस दौर की बड़ी तस्वीर बनाती हैं।पातालकोट की एक यात्रा का जिक्र करते हुए वे बताते हैं कि ट्रांजिस्टर पर पंचम की जयमाला सुनने का रोमांच आज भी स्मृतियों में ताजा है।
विविध भारती ने भाषा और संस्कृति को भी जोड़ा
विविध भारती का प्रभाव केवल संगीत तक सीमित नहीं रहा। देश के अलग-अलग हिस्सों के लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने में भी इसकी बड़ी भूमिका रही। दूरदराज के इलाकों तक पहुंचती इसकी तरंगों ने हिंदी को भी लोगों तक पहुंचाया। आज भी इसके श्रोताओं का दायरा देश के कोने-कोने तक फैला हुआ है। एक फोन-इन कार्यक्रम के दौरान जब त्रिपुरा और कश्मीर से श्रोताओं के फोन आए तो यह अहसास और गहरा हुआ कि विविध भारती की आवाज सचमुच भौगोलिक दूरियों को पाटती रही है।
संगीत सरिता और हाथ से लिखे रजिस्टरों की दुनिया
उस दौर में इंटरनेट नहीं था। कलाकारों और फिल्मों के बारे में जानने के सीमित साधन थे। ऐसे में विविध भारती लोगों के लिए ज्ञान और जानकारी का महत्वपूर्ण स्रोत बन गया। ‘संगीत सरिता’ जैसे कार्यक्रम सुनकर श्रोता कॉपियों में नोट्स लिखा करते थे। गानों की लंबी-लंबी सूचियां बनाई जाती थीं। कई-कई रजिस्टर सिर्फ गीतों और संगीत से जुड़ी जानकारियों से भर जाते थे। आज वही रजिस्टर उस दौर की संगीत-स्मृतियों का निजी दस्तावेज बन चुके हैं।
‘भारत के मध्यवर्गीय जीवन का पार्श्व संगीत’
फिल्मकार ऋषिकेश मुखर्जी ने विविध भारती के बारे में एक बेहद खूबसूरत बात कही थी— “विविध भारती भारत के मध्यवर्गीय जीवन का पार्श्व संगीत है।”
शायद यही इसकी सबसे सटीक पहचान भी है।घरों में, दुकानों में, हॉस्टलों में, चाय की दुकानों पर—हर जगह इसकी आवाज सुनाई देती थी। बुजुर्गों की साथी, गृहिणियों की मीत और बच्चों के लिए मनोरंजन के साथ सीखने का माध्यम। विविध भारती ने भारतीय समाज के सांस्कृतिक मानस को गढ़ने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। फिल्मी गीतों को लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाने और फिल्मों तथा फिल्मी सितारों से लोगों का रिश्ता जोड़ने में इसका योगदान बेहद खास रहा।
एक आवाज, जिसने पूरे देश को जोड़ा
विविध भारती ने सिर्फ कार्यक्रम प्रसारित नहीं किए, उसने यादें तैयार कीं।
उसने एक ऐसी पीढ़ी तैयार की, जिसके लिए रेडियो का मतलब सिर्फ समाचार नहीं था। रेडियो का मतलब था—गीत, आवाजें, किस्से, कलाकार, इंतजार और साथ। और शायद यही वजह है कि आज भी विविध भारती का नाम आते ही लाखों लोगों के भीतर उनका अपना एक पुराना कमरा, पुराना ट्रांजिस्टर और किसी भूले-बिसरे गीत की धुन जाग उठती है।
एक सपना था विविध भारती पर बोलने का…
यूनुस खान लिखते हैं कि विविध भारती पर बोलना उनके लिए एक दीवानगी भरा ख्वाब था। जब यह सपना पूरा हुआ तो लगा जैसे सातवें आसमान पर पहुंच गए हों।विविध भारती से जुड़ने के बाद हर दिन कुछ नया अनुभव करने, नई हस्तियों से मिलने और उनकी बातचीत रिकॉर्ड करने का अवसर मिला—ऐसे अनुभव, जो शायद किसी और माध्यम से संभव नहीं होते।
और फिर वही भावपूर्ण शब्द—
“शुक्रिया विविध भारती। विविध भारती को सालगिरह मुबारक।”
आपकी क्या याद है विविध भारती से? 📻
क्या आपके घर में भी सुबह या शाम विविध भारती बजता था? क्या आपने हवामहल, जयमाला या संगीत सरिता सुना है? क्या आज भी किसी उद्घोषक की आवाज आपको अपना बचपन याद दिलाती है?